25 June 2022
मोदी-2.0 के तीन साल: न सेवा, न सुशासन, बस गरीब पर वार! - राजेंद्र शर्मा

मोदी-2.0 के तीन साल: न सेवा, न सुशासन, बस गरीब पर वार! - राजेंद्र शर्मा

नरेंद्र मोदी के राज के कुल आठ साल और दूसरे कार्यकाल के तीन साल पूरे होने के मौके पर, भाजपा ने 30 मई से 15 जून तक देश भर में, केंद्रीय मंत्रियों को आगे रखकर तडक़-भडक़ भरे आयोजन करने का एलान किया है। आखिरकार, मोदी की पार्टी और सरकार को, ईवेंट मैनेजमेंट में ही सबसे ज्यादा महारत हासिल है और अपनी इसी क्षमता पर उसे सबसे ज्यादा भरोसा है। बहरहाल, दर्ज करने वाली बात यह है कि भाजपा, ‘‘सेवा, सुशासन और गरीब कल्याण’’ को केंद्रित कर ये आयोजन करने जा रही है। इसमें खबर इसलिए है कि अपने आठवें वर्ष के छोर पर मोदी सरकार का ठीक ‘‘सेवा, सुशासन और गरीब कल्याण’’ से ही, सरासर छत्तीस का आंकड़ा नजर आ रहा है। रिकार्ड तोड़ महंगाई व स्वतंत्रता भारत की सबसे ऊंची बेरोजगारी की दर से लेकर, रुपए के मुसलसल अवमूल्यन तथा सुस्त आर्थिक वृद्घि दर तक, इसके सबूत चारों को बिखरे हुए हैं। तब मोदी राज को ‘‘सेवा, सुशासन और गरीब कल्याण’’ का ही प्रतीक साबित करने की यह कसरत क्यों?

इस क्यों के जवाब के दो पहलू हैं, जो आपस में जुड़े हुए हैं। पहला तो यही कि मोदी राज के आठ साल में, मीडिया समेत आम लोगों की राय बनाने के तमाम साधनों पर, सत्तारूढ़ों को जैसा मुकम्मल नियंत्रण हासिल हो गया है, उसके बल पर उन्हें इस असीम भरोसा हो गया है कि सच होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है, वे जो भी चाहेंगे या कहेंगे, उसे ही लोग सच मान लेंगे। जब सच को झुठलाने का इतना भरोसा हो, तो उसका सामना होने से डरकर, बचकर चलने की क्या जरूरत है? और इस भरोसे के साथ जुड़ा हुआ है, ‘‘महाझूठ’’ के हिटलर के बताए सिद्घांत के प्रयोग का प्रलोभन। महाझूठ के सिद्घांत के पीछे यह धारणा है कि लोग छोटे-छोटे झूठ चूंकि खुद भी बोलते हैं, दूसरे भी ऐसे झूठ बोल रहे होंगे इस पर वे आसानी से विश्वास भी कर लेते हैं। लेकिन, अगर इतना बड़ा झूठ बोला जाए कि लोगों को लगे कि ऐसा झूठ तो कोई बोल ही कैसे सकता है, तो ऐसे झूठ को, जाहिर है कि बार-बार बोले जाने पर, लोग अकाट्य सच मान लेते हैं।

बेशक, यह तथ्य है कि पब्लिक रिसर्च ऑन इंडियाज़ कंज्यूमर इकॉनमी का अध्ययन यह बता रहा है कि मोदी राज में 2015-16 से 2020-21 के बीच यानी कोविड महामारी आने से पहले तक, सबसे गरीब 20 फीसद आबादी की आय पूरे 53 फीसद घट गयी। और इसी अवधि में सबसे संपन्न 20 फीसद की आय पूरे 39 फीसद बढ़ गयी। या इसी प्रकार यह तथ्य है कि मोदी शासन में बेरोजगारी उस ऊंचाई पर पहुंच गयी है, जिस पर आजादी के बाद इससे पहले कभी नहीं रही थी। रोजगार में लगे भारतीयों की कुल संख्या, जो मोदी राज आने से पहले, 2013 में 44 करोड़ थी, 2016 तक ही घटकर 41 करोड़ पर आ गयी थी। और 2021 तक यह संख्या 38 करोड़ ही रह गयी, जबकि इसी दौरान देश में काम करने लायक आबादी 79 करोड़ से बढक़र 106 करोड़ हो गयी।

इस कठोर सचाई से हताश होकर आबादी का लगातार बढ़ता हिस्सा रोजगार की तलाश ही छोडक़र बैठता जा रहा है। महामारी का कहर शुरू होने से पहले भी काम कर रहे तथा काम की तलाश कर रहे लोगों का कुल हिस्सा, जिसे श्रम भागीदारी अनुपात कहा जाता है 43 फीसद था। यह महामारी के दो साल बाद गिरकर 39 फीसद ही रह गया है। महिलाओं के मामले में तो यही हिस्सा, जो यूएनडीपी की रिपोर्ट के अनुसार 2013 में 36 फीसद था, महामारी के आने से पहले 2019 में 18 फीसद ही रह गया था। और महामारी के बीच, 2021 की फरवरी में तो यह हिस्सा सिर्फ 9.24 फीसद ही रह गया।

इस तरह, निचले पायदान पर खड़े लोगों की आय और रोजगार, दोनों में तेजी से गिरावट हुई है। और यह गिरावट सिर्फ कोविड के दौर में ही नहीं हुआ है बल्कि उससे पहले से चल रही थी, हालांकि कोविड ने इस गिरावस्ट की रफ्तार को और तेज कर दिया है। और दूसरी ओर, सबसे ऊपर के पायदान पर खड़े दस फीसद की आय तेजी से बढ़ती गयी है। वैसे इस 10 फीसद के भीतर भी बहुत भारी असमानता है। हाल में आए एक आंकड़े के अनुसार, देश के सबसे धनी 10 फीसद के निचले सिरे छोर पर आने वालों की आय 25,000 रु0 महीना से ज्यादा नहीं है, जिसका दूसरा निहितार्थ यह भी है कि 90 फीसद आबादी की आय 25,000 रु0 महीना से नीचे-नीचे है। हां! ऊपरी सिरे पर आने वाले इस 10 फीसद के भी शीर्ष पर स्थित सिर्फ 10 सबसे धनवानों के पास, ऑक्सफैम की पिछली रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कुल संपदा का 57 फीसद हिस्सा था, जबकि  देश की आधी आबादी के पास इसका चौथाई से भी कम यानी देश की संपदा का कुल सिर्फ 13 फीसद हिस्सा था।

इस सब को देखते हुए हर्गिज यह अचरज की बात नहीं है कि वैश्विक भूख सूचकांक पर भारत 2021 में भूख की मार झेल रहे दुनिया के कुल 116 देशों में नीचे फिसलकर 101वें स्थान पर पहुंच गया और उसे ‘भूख के गंभीर स्तर वाले देश’ की श्रेणी में रखा गया है। याद रहे कि इससे एक वर्ष पहले भारत इसी सूचकांक पर 94वें स्थान पर था। बहरहाल, मोदी-2.0 में ‘सेवा’ और ‘सुशासन’ का आलम यह है कि उसने न सिर्फ भूख के सूचकांक पर इस गिरावट से कुछ सबक लेकर कोई सुधार करने की जरूरत समझी है, वास्तव में उसने तो इस सूचकांक पर भारत का और नीचे खिसकना भी लगभग सुनिश्चित कर दिया है। यह किया गया है, एक ऐसे वर्ष में जब जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के चलते खासतौर पर गेहूं की पैदावार में गंभीर कमी के सीजन में, इस सचाई से पूरी तरह बेखबर मोदी सरकार ने पहले तो, रूस-यूक्रेन युद्घ को अनाज के अतिरिक्त भंडारों से कमाई करने का अवसर बनाने के लालच में, दुनिया भर के लिए अनाज की भरपाई करने के लिए बढ़-चढक़र गेहूं का निर्यात करने की नीति का एलान कर के, पैदावार का सामान्य से बड़ा हिस्सा निजी व्यापारियों के हाथों में पहुंचना सुनिश्चित कर दिया। और कुछ ही हफ्तों में इसके चलते जब खुद देश की जरूरतें पूरी करने में कठिनाई आती देखकर सरकार जागी और उसने हड़बड़ी में गेहूं के निर्यात पर रोक का एलान किया, बाजार में गेहूं/ आटे के दाम, खाने-पीने के दाम में पहले ही चल रही भारी महंगाई की तुलना में भी बहुत बढ़ गए। और दूसरी ओर, खुद मोदी राज में भी पहली बार अब सरकार के हाथ में खाद्य सुरक्षा कानून के तहत आपूर्ति की जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त गेहूं नहीं है। नतीजा यह कि अधिकांशत: गेहूंभोजी उत्तर प्रदेश में, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण कार्यक्रम में सिर्फ चावल बांटा जा रहा है। राशन कार्डधारकों की संख्या घटाने की जो मुहिम चल रही है, वह अलग। जाहिर है कि यह सब गरीब के मुंह का कौर छीनने का ही काम करेगा।

इन हालात में भी मोदी सरकार के ‘‘गरीब कल्याण’’ के लिए काम कर रही होने का दावा बेशक इसी के भरोसे पर किया जा रहा है कि, जब हजारों चैनलों से यह दावा किया जाएगा, तो लोग इस सफेद झूठ पर इसलिए भी विश्वास करने के लिए तैयार हो जाएंगे कि, इतना बड़ा झूठ बोलने का साहस कोई कर ही कैसे सकता है? लेकिन, इस दावे के पीछे एक और चीज का भी भरोसा है। और यही वह चीज है जिसमें मोदी-2.0 के तीन साल, मोदी के ही पहले कार्यकाल के पांच वर्षों से भी मीलों आगे हैं। इसका संबंध सरकार के ज्यादा से ज्यादा खुलकर हिंदुत्व के बहुसंख्यकवादी एजेंडा पर अमल करने के जरिए, सत्तापक्ष के पीछे बहुसंख्यकों की ज्यादा से ज्यादा गोलबंदी करने की कोशिश करने से है।

मोदी-2.0 की शुरूआत, धारा-370 को खत्म कर तथा जम्मू-कश्मीर राज्य को ही तोडक़र, इकलौते मुस्लिम बहुल राज्य पर कब्जा करने और उसके बाद, पड़ौसी देशों के हिंदुओं को नागरिकता के मामले में हिंदुओं को विशेषाधिकार देने के जरिए, धर्मनिरपेक्ष भारत में आधिकारिक रूप से हिंदुओं के विशेषाधिकारों का सिलसिला शुरू करने की कोशिशों से हुई थी। और उसके तीन साल पूरे होते-होते, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू होने के बाद अब 1991 के धार्मिक स्थल कानून की पाबंदियों को धता बताते हुए, काशी और मथुरा में मस्जिदविरोधी अभियान इतनी तेजी पकड़ चुके हैं कि उनकी ओट में सेवा, सुशासन, गरीब कल्याण, सब की घनघोर विफलताओं को, छुपाया जा सकता है। इसके पूरक के तौर पर ताजमहल, कुतुब मीनार, आगरा का लाल किला, दिल्ली की जामा मस्जिद, धार की भोजशाला से होते हुए, अजमेर शरीफ तथा बंगलूरु की जमा मस्जिद तक, शहर-शहर और मस्जिद-मस्जिद ऐसे ही विवाद खड़े करने की तैयारियां हैं। आखिरकार, वह सचाई भी तो बहुत बड़ी है जिसे इनकी ओट में छुपाया जाना है। इसमें यह सचाई तक शामिल है कि हिंदुत्ववादियों द्वारा मॉब लिंचिंग का सिलसिला धार्मिक अल्पसंख्यकों के बाद, आदिवासियों व दलितों से होते हुए, अब जैन जैसे खुद को हिंदू मानने वाले अल्पसंख्यकों तक भी जा पहुंचा है!

बेशक, सारे लक्षण इसी के हैं कि मोदी-2.0 के बाकी दो वर्षों में यह सारा सिलसिला और आगे बढ़ेगा। इसके हिस्से के तौर पर संसदीय व्यवस्था और मीडिया समेत, तमाम जनतंत्र के लिए जरूरी संस्थाओं को खोखला करने का और संविधान को निष्प्रभावी बनाते हुए भारतीय राज्य को हिंदू राज में तब्दील करने के कदमों का सिलसिला भी आगे बढ़ाया जाएगा, ताकि सत्ता पर संघ-भाजपा का कब्जा बनाए रखा जा सके।  लेकिन, कब तक? महाझूठ के असर की भी एक सीमा है। किसी ने कहा है कि कुछ समय के लिए सब लोगों को और कुछ लोगों को हमेशा के लिए बेवकूफ बनाया जा सकता है, लेकिन सब लोगों का हमेशा के लिए बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता है। कोरोना काल में ही सामने आया, साल भर लंबा विजयी किसान आंदोलन इसका बड़ा इशारा है कि भारतीय मेहनतकशों को भी हमेशा बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता है।

 


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